सन्त गणीनाथ चालीसा

" सन्त गणीनाथ चालीसा "

शत् शत् प्रणाम इस माटी को, सन्तो ने तिलक लगाया है |
खेले है राम, कृष्ण, गौतम, गांधी ने माथ चढ़ाया है ||
भगवान भक्त के वश में हो, घर रूप सगुण आ जाते है |
अपनों की पीड़ा हरने को, बहु दया दृष्टि बरसाते है ||
सम्बत् एक हजार सात विक्रम, श्री कृष्ण जन्मोत्सव रहा पर्व,
सब झूम-झूम कर नाच रहे, भक्तो का भी बढ़ रहा गर्व |
ऐसी ही मंगल बेला में, शिव पूजा की मंशा जागी,
फिर मनसा पत्नी शिव संग, जप-तप में हो गये वैरागी |
शिवपूजन अर्चन कीर्तन में, दोनों प्राणी तल्लीन हुए,
तन सूख गया व्रत धारण में, शिव-जगदम्बा अधीन हुए |
कीर्तन करते-करते दोनों, गिर पड़े धरा मूर्छित हो,
चर-अचरो को अभास हुआ, शिव नाच रहे हो क्रोधित हो |
थर-थर कापने लगी धरती, देवो में हाहाकार मचा,
हिल गया ताज भी देवरज के, हिलने से हिमालय नही बचा |
इतने में गिरिजा साथ नाथ, शिव भोले बाबा प्रकट भये,
मूर्छा से मनसा-शिव मुक्त, सर्प युगल भांति पद लिपट गये |
हतप्रभ हो मनसा-शिव मौन, कुछ मुख से बोल न पाते है,
अन्तरयामी यह दृश्य देख, तब मन ही मुस्काते है |
तत्क्षण एक नवजात शिशु, दे दिये गोद जगदम्बा की,
जननी जगदम्बा वह प्रसाद, माँ शिव को दे अनुकम्पा की |
इस अवसर पर हर-हर महादेव, जय चतुर्दिक गूंज रहा,
अम्बर भी पुष्प बृष्टि करके, है भूतनाथ को पूज रहा |
आहलादित मनसा राम-शिव, आखों में आंसू भर लाए,
पूजन दर्शन देशाटन कर, गृह नगर पाटिलपुत्र आये |
सब नगर निवासी स्नेही जन, उललास में उत्सव करवाये,
कांदू मध्येशिया समाज में दम्पति को, सम्मान सहित है बैठाये |
अजैविकय इस बालक को, जब नामकरण का दिन आया,
मनसा जी ने तब महल में ही, सदर कुल पुरोहित बुलवाया |
ग्रह नक्षत्र देख कुण्डली बनी, गणिनाथ नाम है रखवाया |

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