महामना दसरथ राम उपाख्य - महाशय जी

Posted By: रामदास गुप्त (प्रदेश अध्यक्ष 2014-2017)

On: 25-03-2017

Category: महत्वपूर्ण व्यक्ति

Tags: आज़मगढ़

आजमगढ़ नगर के निकटस्थ ग्राम नेमदारपुर में ज्येष् शुक्ल दशमी सन 1902 ई० में श्रीमन्त महावीर प्रसाद मद्धेशिया की धर्मपत्नी श्रीमती सुखवंती देवी के पवित्र कुक्षि से एक तेजस्वी होनहार शिशु प्रादुर्भूत हुआ जिसे माननीय दशरथ राम, उपाख्य श्री महाशय जी कहते हैं | श्री दसरथ राम अपने पिता के योग्य , विचारवान और परिश्रमी सन्तान थे , इनके तीन भाई तथा एक बहन थी , जो तत्कालीन महामारी के प्रकूप से काल - कवलित हो गये | ऐसी विषम परिस्थिति में श्री महावीर प्रसाद अपने ग्राम नेमदारपुर को छोड़ कर अपने ननिहाल आजमगढ़ आ गए तथा पूरा गुलामी मोहल्ला में गल्ले और किराने की एक छोटी सी दुकान खोलकर अपनी आजीविका का शुभारम्भ किया |

श्री महावीर राम अपने व्यापर में अपने शिष्ट आचरण, ईमानदारी , मधुर व्यव्हार , वाणी से धीरे धीरे उन्नति की ओर अग्रसर होने लगे | इसी अन्तराल में वे आजमगढ़ में बाजबहादुर मोहल्ले में एक मकान खरीदकर रहने लगे | श्री दशरथ राम का विवाह विन्दवल जयराजपुर की सुश्री रामप्यारी देवी के साथ वेद - मंत्रो के सस्वर पा एवं बाघ- वृन्दो के सुमधुर ध्वनि के मध्य बाज बहादुर आज़मगढ़ के इसी पुराने मकान में सम्पन्न हुआ |

श्री महावीर राम अपनी किराने की दुकान को स्वयं संभालते थे तथा गल्ले की दुकान का दायित्व श्री दशरथ राम के कंधो पर सौप दिए थे | पिता - पुत्र क ोर परिश्रम करके दोनों दुकानों में अभूतपूर्व प्रगति किए , धन भी अर्जित किए तथा प्रतिष् ा भी प्राप्त किए | परिणाम स्वरुप बाजबहादुर आजमगढ़ में दो भव्य भवन , गोदाम, बाग - बगीचे तथा सुख के सभी उपकरणों से संम्पन हो गये | अब श्रीयुत दशरथ राम उपाख्य श्री महाशय जी की गणना आजमगढ़ के मानिन्द लोगो में होने लगी |

समय की गति के साथ माननीय दशरथ राम के 21 फरवरी , सन 1934 ई० में श्री शिवप्रसाद गुप्त तथा 9 मई , सन 1943 ई० में श्री विष्णु प्रताप गुप्त नामक दो पुत्र उत्पन्न हुआ | सम्प्रति श्री डॉ० विष्णु प्रसाद गुप्त , राजकीय सेवा में सी० ऍम० यस० है, इनके पुत्र श्री डॉ० जय प्रकाश गुप्त, राजकीय सेवा में ही दन्त सर्जन है तथा इनकी बहु किंग जार्ज मेडिकल कालेज , लखनऊ में एनोटमी विषय में प्रवक्ता है | अपने समस्त परिवार के साथ सुखमय जीवन - यापन करने वाले माननीय शिवप्रसाद गुप्त एम० काम० सम्पूर्ण परिवार के अधिष् ता, वैश्य समाज के बहुचर्चित पुरुष तथा समाज के मान्य नेता है | इनके श्री त्रिवेदी प्रसाद , श्री ओमप्रकाश एवं श्री भगवती प्रशाद गुप्त नामक तीन पुत्र है , जो तेजस्वी वरिष् जनों के समुख श्रध्दावनत, आज्ञाकारी एवं कर्म है |

राजनीति में प्रवेश

महात्मा गाँधी के आहवाहन पर सन 1920 ई० में श्री दशरथ राम विद्यालयिय अध्यन से विरत हो कांग्रेस के सक्रीय सदस्य बन गये और खादी पूर्ण रुपेण धारण कर लिये | वे अपने व्यापार की देख - रेख करते हुए कांग्रेस के कर्म कार्यकर्ता के रूप में अपने उद्देश्यो को लेकर आजमगढ़ के बहार दूर - दूर तक गए , लोगो से संपर्क किये | सिद्धांतो को समझाए ,सच्चे स्वराज्य की परिकल्पना दिये तथा सक्रीय सदस्य बनाये | इस कारण इनका प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी में सम्मान बढ़ गया | इसी मूल भुत कारण से कांग्रेस के श्री रामधन स्वर्गीय भोला राम मधेशिया , स्वर्गीय महेश राम , श्री विश्राम राय, स्वर्गीय रामानन्द गुप्त एवं स्वर्गीय सीता राम अस्थाना सदृश लोग बाज बहादुर आते थे , श्री महाशय जी से मिलते थे तथा अपेक्षित मदद प्राप्त कर प्रस्थान करते थे |

माननीय दशरथ राम की लोकप्रियता से प्रभावित हो, कांग्रेस पार्टी ने उन्हें आजमगढ़ नगर पालिका के सीता राम वार्ड से सभासद के लिए खड़ा किया | वे सर्वाधिक मतों से विजेयी हुए और 1952 से सन 1974 तक निरंतर सभासद रहे | उन्होंने अपने सभासद पद के अंतिम संघर्ष में आजमगढ़ के राजा कुंवर मुअज्ज़म साहब को मत - पत्रों की गणना में अनेक बार पिछली पंकित में कर दिया था | इसी व्यापक समर्थन के कारण जनता उन्हें अजात शत्रु कहकर पुकारती थी |

धार्मिक कार्य

माननीय दशरथ राम की सेवा धार्मिक क्षेत्र में अनुकर्णीय है | वे आर्य समाज के सदस्य बनकर समाज में धार्मिक सहिष्णुता की अवस्थिति स्थापित किये | धर्म के वास्तविक स्वरुप के पोषक बनकर कट्टरता , ढकोसला , ढोंग को समाप्त किये | वैदिक आचार विचार एवं संस्कृति पर बल दिए | वेद वैदिक आचार्य पद्धति और धर्म का प्रचार किये | छुआ छूत ऊँच नीच जाति - पाति के भेद भाव को मिटाए था धर्म के शाश्वत स्वरुप को स्थापित किये |

माननीय दशरथ राम वेदों के प्रकांड विद्वान श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी द्वारा रचित पुस्तकों एवं पत्रिकाओं का प्रचार प्रसार प्रान्तीय स्तर पर किया | वे स्वाध्याय तथा आर्य बंधुओ के ज्ञानवर्धन के लिए पांच हज़ार से अधिक वेद , उपनिषद , गीता, रामायण, महाभारत, पुराण आदि पुस्तकों का संग्रह किये थे | इन धार्मिक पुस्तकों को वे स्वयं पढ़ते थे, उस पर चिंतन मनन करते थे तथा इतर आर्य बन्धुवों को ज्ञान अर्जित कर , चिंतन के लिए एवं उसका उपयोग करने के लिए प्रेरित करते थे | श्री दशरथ राम के इस कार्य तथा आर्य समाज के प्रति अनन्य अनुराग के कारण आर्य समाज के श्रेष्ट प्रचारक श्रदेह रामान्द शास्त्री काशी, स्वनाम धन्य गंगा प्रसाद उपाध्याय प्रयाग सदृश लोग बाजबहादुर , आजमगढ़ बराबर आते थे , सत्संग हवन यज्ञ करते थे और माननीय महाशय जी के सेवा सत्कार से सन्तुष्ट हो अपने आश्रम को प्रस्थान कर जाते थे |

समाज सेवा

माननीय दशरथ राम जी समग्र समाज के सेवा में निरत रहते हुए स्वजातीय सेवा के प्रति भी अत्यंत अभिरुचि रखते थे | वे श्रध्देय महात्मा सरयू दास , संस्थापक करजौली खुरहट अनाथालय मऊ, माननीय महादेव प्रसाद , को ी हनुमान गंज , बलिया , स्वामी ग्राम सेवक दास , श्री जगन्नाथ प्रसाद , मऊनाथ भंजन , श्री रामलगन राम अमिला और महावीर प्रसाद विगुलर फैजाबाद के साथ अखिल भारतीय मध्देशीय वैश्य महासभा के राष्ट्रीय प्रान्तीय तथा जनपदीय सम्मेलनों में देश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में उत्साहपूर्वक सम्मिलित होते थे तथा महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन करते थे |

माननीय दशरथ राम व्यापर मंडल , गोशाला समिति , स्वामी दयानंद इंटर कालेज , कांग्रेस, आर्य समाज तथा मध्देशिया वैश्य महासभा के अनेक वर्षो तक महत्वपूर्ण पदों पर पदाधिकारी रहे , कार्य किये था निर्देशन देते रहे | करजौली खुरहट अन्थाश्रम , मऊ तो उनके मुख्य कार्य का केंद्र था | अनाथाश्रम में देश के कोने - कोने से अनाथ , असहाय , निराश्रित एवं अकिंचन बालक - बालिकाओं को परवेश दिलाना , उनके आवास , भोजन, वस्त्र , दवा , अध्ययन एवं अध्यापन की सम्यक व्यवस्था करना उनके सेवा प्रकल्प का मुख्य उदेश्य था | श्रद्धेय महाशय जी आजीवन करजौली खुरहट अनाथआश्रम मऊ से संयोक्त रहे तथा सेवा कार्य करते रहे | अपने जीवन यात्रा के अंतिम पड़ाव में वे हृदय व स्वांस रोगों से ग्रस्त हो गए तथा जीवन यात्रा के 98वे वर्ष अंतिम क्षणों में 01 अगस्त 2000 ई० में ब्रह्म मूहुर्त में आंखे मूँद लिए , जीवन यात्रा समाप्त कर दिए और ब्रह्म्भीत हो गए |

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