श्री महावीर प्रसाद गुप्त "बिगुलर"

Posted By: संतोष कुमार गुप्त

On: 04-03-2016

Category: महत्वपूर्ण व्यक्ति

Tags: जौनपुर

आजादी के दीवानों की गाथाये भी अब मात्र किताबो और पत्रिकाओं तक ही सिमटती जा रही है | ऐसे में आज आवश्यक है कि आजादी के दीवानों के बारे में आज के युवा पीड़ी कुछ जाने, कुछ समझे और उनसे कुछ सीखे | आजादी के लड़ाई के दोरान दीवानों में से मध्यदेशीय वैश्य समाज को भी गर्व है कि किसी समाज के अग्रणी सेनानी महाबीर प्रसाद गुप्त "बिगुलर" जिन्होंने अपना सर्वस्व देश पर न्योछावर कर दिया | पं० नेहरू भारत माता के प्रथम प्रधानमन्त्री बनने के बाद जब नवाबो की नगरी फैजाबाद में पहली बार आगमन हुआ तो जंग ए आजादी ने बिगुल बजा अंग्रजी हुकूमत की नीद हराम करने वाले स्वतन्त्रता सेनानी महाबीर प्रसाद को उपाधि से विभूषित करते हुए उन्हें एक ताम्र का बिगुल प्रदान किया था तभी से वे बिगुलर के जाने पहचाने जाने लगे | जनपद फ़ैजाबाद के मध्यदेशीय वैश्य समाज बाहुल्य मु०-हैदरगंज उस जमाने में कराई लइया खांडसारी व राब का प्रमुख निर्माण केन्द्र हुआ करता था | पूरी गली में सिरे की भीनी-भीनी सुगन्ध फैली रहती थी | यही रहते थे माता प्रसाद गुप्त जो शक्कर व खाण्डसारी के कारोबारी थे | इन्ही के पुत्र के रूप में कार्तिक मास में 14 जुलाई 1906 को महाबीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म हुआ था | जो बाद में बिगुलर उपाधि से विभूषित हुए | सात साल के हुए तो पड़ाई लिखाई शुरू की | निःसन्तान चाचा उदयी राम उन्हें बहुत मानते थे | और उन्हें वे रामायण, महाभारत और गीता पढकर सुनाया करते थे | स्कूल में शिवाजी टुरूप नामक एक छात्र दल हुआ करता था | उसमे शामिल हुए तो जल्द ही उन्हें उनका मुखिया बना दिया गया | यह दल देशवासियों में राष्ट्रीयता का प्रचार- प्रसार करता था | 15 साल के थे तो इनका विवाह विरजा देवी से हो गया था और सन् 1920 में पिता का साया भी इनके से उ गया था | उसी साल महात्मा गांधी फ़ैजाबाद आये | बिगुलर भी उनके भाषण सुनते ही प्रभावित हुए और वे कांग्रेस में जुड़ गये और कांग्रेस स्वयं सेवक संघ के जिले में प्रधान बना दिये | 19 दिसम्बर 1927 को जब सेनानी असफाक उल्ला खां को फैजाबाद जेल में फांसी दी गयी तो विरोध आन्दोलन में वे भी शामिल हुए | पकड़े गये और जेल में डाल दिये गये तथा कुछ दिनो के बाद रिहा हुए तो 1928 में इनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी | दुःख की इस घड़ी में भी वे राष्ट्रीय आन्दोलन से पीछे नही हुए | इनका दूसरा विवाह 1921 में मैना देवी से हुआ |

कांग्रेस में लगानबन्दी आन्दोलन छेडा तो सेनानी महाबीर प्रसाद गुप्त ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और अंग्रेजी हुकूमत की नजर में चढ़ गये | पुलिस ने 1932 में इन्हे गिरफ्तार कर लिया और साढ़े छ: मास की कड़ी कैद और 50 रुपये जुर्माना की सजा दी | महात्मा गांधी के स्वदेशी आन्दोलन में सक्रीय भूमिका रही | विदेशी सामान का बहिष्कार व उसकी होली जलाने में वे आगे रहे | इसमे भी कैद व जुर्माना की सजा मिली, जुर्माना अदा न करने पर डेढ़ माह की कैद और बढ़ा दी गयी | सन् 1932 का दाैर था | सेनानी महाबीर प्रसाद जेल में कैद थे | अंग्रेज सरकार का गवर्नर जेल में आया, उसके सम्मान में कैदियों की परेड, जेलर ने आयोजित की | परेड में शामिल होने से इन्कार करने पर इन्हे काल को री में डाल कर यातनाए दी गयी | इस कृत्य पर उन्हें लखनऊ से इटावा जेल भेज दिया गया, वहां से जब वे रिहा हुए तो 1933 में पुनः इन्हे तीन महीने की नजरबन्दी की सजा दे दी गयी 1938 में सेनानी महाबीर प्रसाद ने सेवादल के ' स्वतन्त्र बैण्ड ग्रुप ' की स्थापना की |

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पण्डित नेहरु जब अयोध्या आये तो उनके बैण्ड ग्रुप ने उन्हें सलामी दी जिससे प्रसन्न होकर पण्डित नेहरु ने उन्हें एक ताम्र बिगुल प्रदान कर "बिगुलर" की उपाधि से सम्मानित किया | सेनानी "बिगुलर" सदैप पीली टोपी, खादी का पीला कुरता-सदरी तथा खादी का सदैव पैजामा ही पहनते थे और हर समय उनके कंधे पर लटकता रहता था उनका बिगुल | यह बीर सेना आज हमारे बीच नही है | इलाज के दाैरान 11 जनवरी सन् 1983 को हैजा जैसी बीमारी से पीड़ित होकर अयोध्या स्थि़त कालरा अस्पताल में यह सेनानी हमारे बीच से चल बसा | बस शेष रह गयी तो सेनानी "बिगुलर" की स्मृतिया |

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